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टी. बी. का निदान : आशा की नई किरण टी. बी. के कारण भारत में प्रतिवर्ष 4 लाख लोगों की मृत्यु होती है, जिसमें महिलाओं की संख्या काफी अधिक है, किंतु, सरकार, गैर-सरकारी संगठनों और नागरिकों की प्रतिबद्धता के परिणामस्वरूप इन पर अंकुश लगाने में हम सफलता की ओर बढ़ रहे हैं। विश्ल्षण कर रहे हैं कुमार अमन यक्ष्मा अथवा टी. बी. की बिमारी का इतिहास बहुत पुराना है, वेद और आयुर्वेदिक संहिता में भी इसका उल्लेख मिलता है। इस बीमारी का समुचित इलाज न होने पर यह जानलेवा सिद्ध हो सकता है। यक्ष्मा एक संक्रमण बीमारी है, जो माइक्रोबैक्टीरियम ट्यूबरक्यूलोसिस नामक बैक्टीरिया द्वारा फैलता है। संक्रमित व्यक्ति के खांसने अथवा छीकने पर इस बीमारी के बैक्टीरिया हवा में फैल जाते हैं, जो दूसरे व्यक्ति द्वारा सांस लेने पर उसके शरीर में पहुंच जाते हैं। टी. बी. के बैक्टीरिया का आक्रमण सामान्यतः मनुष्य के फेफङे पर होता है, परंतु शरीर के अन्य अंग भी इससे प्रभावित हो सकते हैं, जैसे गुर्दा, रीढ़, दिमाग, घुटना आदि। टी. बी. के मुख्य लक्ष्ण हैं : 1. तीन हफ्ते याइससे अधिक तक खांसी 2. सीने में दर्द 3. कफ में खून की उपस्थिती इसके अतिरिक्त कुछ अन्य लक्ष्ण भी हैं : 1. कमजोरी और थकान 2. वजंन में कमी 3. भूख की कमी 4. ठंड लगना 5. बुखार 6. रात के समय पसीना आना, इत्यादि टी. बी. के मामले में भारत की स्थिती दुनिया में सबसे खराब है। टी. बी. के कारण भारत में प्रति वर्ष होने वाली मृत्यु की संख्या लगभग 7 लाख है। अन्य किसी भी संक्रामक बीमारी के मुकाबले भारत में टी. बी. से सर्वाधिक मृत्यु होती है। आधुनिक टी. बी. रोधी उपचार में इतनी क्षमता है कि वो सभी रोगों का उपचार कर सके। हालांकि, यह काफी महत्तवपूर्ण है कि उपचार निर्धारित समय के अंतर्गत प्रारंभ हो जाना चाहिए। उपचार की प्रक्रिया काफी लंबी है, मरीज को लगातार छह महीने तक दवा खानी पङती है। परंतु मरीज को 1-2 माह में ही लाभ का अनुभव होने लग जाता है, साथ ही यह तथ्य भी महत्तवपूर्ण है कि टी. बी. के मरीजों में अधिकांश सामान्य तौर पर बेरोजगारी या गरीबी का सामना कर रहे होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उपचार में अनियमितता उतपन्न हो जाती है। टी. बी. रोधी उपचार उपलब्ध करवा देने मात्र से यह सुनिश्चित नहीं किया जा सकता कि मरीज़ स्वस्थ हो जाएंगे। उचित व मानक इलाज के अलावा मरीज को आराम करने की सलाह दी जाती है, साथ ही उनको पौष्टिक आहार लेने की सिफारिश भी की जाती है।
टी. बी. के क्षेत्र में भारत में एक सर्वथा अलग व लंबी शोध प्रक्रिया की परंपरा है।बैंगलोर स्थित नेशनल ट्यूबरक्यूलोसिस इंस्टिट्यूट और चेन्नई स्थित ट्यूबरक्यूलोसिस रिसर्च सैंटर ने पूरे विश्व में टी. बी. रोगियों के उपचार को सुधारने के लिए काफी महत्तवपूर्ण जानकारी उपलब्ध करवाया है। डायरेक्टली आबॅसर्व्ड ट्रीटमेंट (डाट्स) DOTS (डाट्स) को रिवाइज्ड नेशनल ट्यूबरक्यूलोसिस कंट्रोल प्रोगराम के रूप में जाना जाता है और यह टी. बी. को नियंत्रित करने के लिए एक समग्र रणनीति समझा जाता है। यही एकमात्र एसी रणनीति है जिसका व्यापक स्तर पर सकारात्मक परिणाम सामने आया है।वर्ष 1993 के उपरांत भारत के विभिन्न हिस्सों में डाट्स का उपयोग और इसका परीक्षण किया गया है, जिसके काफी उत्साहजनक परिणाम प्राप्त हुए हैं। जून 2005 की समाप्ति तक लगभग 30 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों के 103 लाख लोगों तक अपनी पहुंच बना ली। टी. बी. के मुहीम के पांच प्रमुख तत्व राजनीतिक व प्रशासनिक प्रतिबद्धता : भारत में रोगों से होने वाली मृत्यु में टी. बी. एक महत्तवपूर्ण कारण है। महिलाओं की मृत्यु अन्य किसी भी रोग की तुलना में इस रोग से सर्वाधिक होती है। चूंकि यह खतरनाक संक्रामक रोग है, अतः सरकार ने भी इसके विरूद्ध मुहीम को प्राथमिकता प्रदान की है, जिसे निश्चित रूप से जारी रखा जाना चाहिए और दिनानुदिन इसके जमीनी स्तर पर विस्तार की रणनीति बनाई जानी चाहिए। गुणवत्तायुक्त जाँच : उच्च स्तरीय माईक्रोस्कोपी स्वास्थय कार्यकर्ताओं को ट्यूबरकल बैसिल को देख पाने की सुविधा प्रदान करती है, जो रोगियों की जांच के लिए अनिवार्य है। गुणवत्तायुक्त दवाईयां : टी. बी. रोधी दवाईयों की नियमित आपूर्ति को अनिवार्य समझा जा सकता है। रिवाइज्ड नेशनल ट्यूबरक्यूलोसिस कंट्रोल प्रोगराम के अंतर्गत रोगियों के पंजीकरण के उपरांत उनको एक उपचार बाक्स प्रदान किया जाता है, जो इस तथ्य को सुनिश्चित करता है कि रोगी को समुचित दवाई की आपूर्ति की जा चुकी है। अतः डाट्स के अंतर्गत उपचार कभी भी दवाईयों के आभाव में असफल नहीं हो सकता। उचित उपचार : रिवाइज्ड नेशनल ट्यूबरक्यूलोसिस कंट्रोल प्रोगराम के अंतर्गत सर्वोत्तम टी. बी. रोधी दवाईयां उपलब्ध करवाईजाती है। लेकिन जब तक उपचार की प्रक्रिया को रोगियों के लिए सुविधाजनक नहीं बना लिया जाता, इसकी सफलता में संदेह बना रहेगा। नियमित निगरानि व लाभ : यह का र्यक्रम निश्चित रूप से रोगियों के लिए लाभदायक है। स्वास्थय प्रणाली के प्रत्येक चरण के अंतर्गत रोगियों के स्वस्थ होने की गणना की जाती है और कोइ भी क्षेत्र जहां आशाऐं पूरी न हो पाइ हों, उसका पुनरावलोकन किया जाता है। भारत में डाट्स की स्थिती : भारत में टी. बी. को नियंत्रित करना एक बहुत बङी चुनौती है। भारत में इसका आक्रमण नियमित रूप से जारी है। प्रतिवर्ष लगभग 18 लाख रोगों में यह रोग विकसित हो रहा है, जिसमें लगभग 8 लाख लोग संक्रमित होते हैं और हालिया स्थिती तक लगभग 7 लाख लोग प्रतिवर्ष इसके शिकार हो रहे हैं। यहां इस बात में कोई संदेह नहीं रह जाता कि सामाजिक व आर्थिक विकास के सामने यह बहुत बङी बाधा बन चुकी है। एक आकलन के अनुसार बीमारियों के कारण 1000 लाख कार्य के दिन की हानि होती है, परिणामस्वरूप देश की उत्पादकता पर निश्चित रूप से नकारात्मक असर पङता है। हालांकि, रिवाइज्ड नेशनल ट्यूबरक्यूलोसिस कंट्रोल प्रोगराम आज देश के कई कोनों तक पहुंच चुकी है और इसके बेहतर परिणाम भी प्राप्त होने लगे हैं, जिससे आशा की एक नई किरण का संचार हुआ है।
रिवाइज्ड नेशनल ट्यूबरक्यूलोसिस कंट्रोल प्रोगराम के अंतर्गत भारत में प्रतिदिन 15000 लोगों की, टी. बी. की मुफ्त जांच की जाती है, जिसमें से लगभग 3200 मरीजों का उपचार प्रारंभ हो जाता है और 2500 से अधिक लोगों को इसका शिकार होने से बचा लिया जाता है और जिस कारण अन्य लोगों तक इसके फैलाव पर भी अंकुश लगाया जा रहा है। लक्ष्य की प्राप्ति के लिए लगभग 750000 स्वास्थय कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने के उपरांत उनकी नियुक्ति की गई है और 10000 से अधिक माइक्रोस्कोपी केन्द्रों का आधुनिकरण किया गया।
टी. बी. और एच. आई. वी. एच. आई. वी. के शिकार लोगों में टी. बी. संक्रमण काफी अधिक होता है। सामान्य लोगों के संक्रमित होने की 10% संभावना की तुलना में एच. आई. वी. ग्रस्त लोगों में इस की संभावना कम से कम 50% होता है। टी. बी. संक्रमण के टी. बी. रोग में विकसित हो जाने की संभावना भी एच. आई. वी. से ग्रस्त लोगों में अधिक होती है। एच. आई. वी. के एड्स के रूप में विकसित हो जाने में भी इसकी अहम भूमिका होती है और यह रोगी के जीवन को भी छोटा बना देती है। अतः यहां यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि टी. बी. और एच. आई. वी. एक दूसरे से आंतरिक स्तर पर जुङे हुए हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि फिलहाल भारत में एच. आई. वी. ग्रस्त लोगों की अनुमानित संख्या लगभग 50 लाख है। भारत में डाट्स के विस्तार का भविष्य भारत सरकार ने वर्ष 1992 में वर्ल्ड हैल्थ आर्गेनाइजेशन और स्विडिश इंटरनेशनल डेवलपमेंट एजेंसी के साथ मिल कर राष्ट्रीय टी. बी. कार्यक्रम की समीक्षा की और प्रबंधन की कमी, पर्याप्त धन राशि का आभाव, एक्स रे पर अत्याधिक भरोसा, मानकहीन उपचार, उपचार के पूरे होने का निम्न दर और प्रक्रियाबद्ध जानकारी प्रणाली का अभाव आदि तथ्य सामने आए। इसके दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि इन रोगियों में से मात्र 30 प्रतिशत ही इस रोग के चंगुल से पूरी तरह मुक्त हो पाए हैं। इन परिणामों के आधार पर देश में अक्टूबर 1993 को रिवाइज्ड नेशनल ट्यूबरक्यूलोसिस कंट्रोल प्रोगराम प्रारंभ किया गया और इसकी सफलता का अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता हैकि यह आज देश की 10% आबादी तक पहुंच चुका है। लेकिन इस कार्यक्रम को प्रोत्साहित करने में राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय ऐजेंसियों की भूमिका को अनदेखा नहीं किया जा सकता। रिवाइज्ड नेशनल ट्यूबरक्यूलोसिस कंट्रोल प्रोग्राम को आंध्र प्रदेश और उङीसा में विस्तार प्रदान तरने के लिए जहां एक ओर डी. एफ. आई. डी. और डी. ए. एन. आई. डी. ए. अपना पूरा सहयोग उपलब्ध करवा रही है, वहीं दूसरी ओर ग्लोबल फंड एड्स, ट्यूबरक्यूलोसिस और मलेरिया उन्मूलन के लिए डाट्स को विस्तार प्रदान करने के उद्देष्य से झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तरांचल राज्यों को पूरा सहयोग प्रदान कर रहा है। जून 2005 तक 565 जिलों से रिवाइज्ड नेशनल ट्यूबरक्यूलोसिस कंट्रोल प्रोगराम को क्रियांवित करने की जानकारी मिल चुकी है। 30 राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों में भी इसका प्रभावशाली क्रियांवयन किया जा रहा है। उपचार के सफलता की दर निरंतर ऊपर की ओर उठ रही है और आज परिणाम इतने उत्साहजनक मिल रहे हैं कि भारत में इसकी सफलता को विश्व के लिए भी एक मानक माना जाने लगा है।
अन्य क्षेत्रों के साथ साझेदारी निजी स्वास्थय देखभाल प्रणाली के क्षेत्र में भारत विश्व का सबसे बङा देश माना जाता है और अनुमान के आधार पर लगभग 70 लाख निजी अभ्यासकर्ता यहां हैं। रिवाइज्ड नेशनल ट्यूबरक्यूलोसिस कंट्रोल प्रोगराम ने निजी स्वास्थय देखभाल प्रणाली व गैर सरकारी संस्थाओं के साथ साझेदारी विकसित किया है, ताकि पहुंच का दायरा व्यापक बनाया जा सके। आज की तिथी में लगभग 5000 निजी अभ्यासकर्ता और 1000 गैर सरकारी संगठन रिवाइज्ड नेशनल ट्यूबरक्यूलोसिस कंट्रोल प्रोगराम से की सेवाऐं प्रदान कर रहे हैं। 213 मेडिकल कालेजों में से 206 रिवाइज्ड नेशनल ट्यूबरक्यूलोसिस कंट्रोल प्रोगराम से जुङे हुए हैं और कार्यक्रम को क्रियांवित कर रहे हैं। दूसरी ओर भारत सरकार ने सफलता पूर्वक श्रम मंत्रालय, रेलवे, खनन व स्टील जैसे क्षेत्रों को भी रिवाइज्ड नेशनल ट्यूबरक्यूलोसिस कंट्रोल प्रोगराम से जोङा है। अकेले केरल में सभी 17 ई. एस. आई. अस्पतालों को माईक्रोस्कोपी जांच केन्द्र और 125 डिस्पेंसरी को डाट्स केन्द्र बनाया गया है। इसी तरह पश्चिम बंगाल में 17 में से 9 ई. एस. आई. अस्पताल और रेलवे अस्पताल रिवाइज्ड नेशनल ट्यूबरक्यूलोसिस कंट्रोल प्रोगराम के अंतर्गत अपना सहयोग प्रदान कर रहे हैं। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए ही भारत सरकार ने सरकारी और निजी क्षेत्र के मिश्रित प्रयास को प्रोत्साहित करने के लिए पब्लिक प्राइवेट मिक्स (पी. पी. एम.) की पायलट परियोजना की पहल देश के 17 राज्यों में की है, जिनमें वर्ल्ड हैल्थ आर्गेनाइजेशन तकनीकि सहायता उपलब्ध करवा रहा है। रिवाइज्ड नेशनल ट्यूबरक्यूलोसिस कंट्रोल प्रोगराम को सफलता प्रदान तकने के लिए वर्ल्ड इकोनोमिक फोरम भारत सरकार के साथ नजदीकी स्तर पर क्रियाशील है।
बहरहाल, विकास के साथ-साथ बीमारियों का शिकंजा भी भारत के नागरिकों पर कसता जा रहा है, किंतु इसके विरूद्ध सरकारी व जन-प्रतिबद्धता से निरंतर इन बीमारियों का मुकाबला करते आ रहे हैं, जिसमें हमें एक हद तक सफलता भी मिली है। इस प्रतिबद्धता की नियमितता को बनाए रख कर शायद हम वह दिन भी देख सकें, जब ये संक्रामक रोग पूर्ण रूप से समाप्त हो जाए।
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